न वयं शास्त्रवरणे शास्त्रमेव वरं वृतम्।
यत्र यत्र विधिः सृष्टेः तत्र तत्र गता वयम्॥
हम शास्त्रों का चुनाव नहीं करते, अपितु शास्त्र ही हमारा चुनाव करते हैं।
जहाँ भी सृष्टि की नियति ले जाती है, हम उनके द्वारा वहीं ले जाए जाते हैं।
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